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VOL. 8, ISSUE 3 (2023)
मौलिक कर्त्तव्य एवं राज्य के नीति निर्देशक तत्व का मौलिक अधिकारों के साथ अध्ययन
Authors
डॉ पुष्पेंद्र कुमार मुशा, सुमन सांदड
Abstract
कर्त्तव्य अधिकारों से अधिक महत्वपूर्ण हैं। अधिकारों का सही उपयोग तभी सम्भव है, जब कर्त्तव्य की सही समझ हो। प्रारम्भ में संविधान सभा द्वारा भारत के संविधान में मौलिक कर्त्तव्यों का समावेश नहीं किया गया था, केवल मौलिक अधिकारों का ही समावेश किया गया था। मौलिक अधिकारों के दुरूपयोग की आशंका से संविधान में मौलिक कर्त्तव्यों का पृथक से उल्लेख किया जाना आवश्यक है, फलतः संविधान के 42 वें संशोधन द्वारा मौलिक कर्त्तव्यों का समावेश कर दिया गया। इसमें नागरिकों के 10 मौलिक कर्त्तव्यों का उल्लेख है। ‘उन्नीकृष्णन बनाम आन्ध्रप्रदेश‘ राज्य के मामले में उच्चतम न्यायालय ने उपयुर्क्त बात को पुनः दोहराते हुये कहा है कि “मूल अधिकार और नीति निर्देशक एक दूसरे के पूरक हैं और भाग-3 के उपबन्धों का निर्वचन संविधान की उदेशिका तथा राज्य के नीति निदेशक तत्वों के सन्दर्भ में करना चाहिये।” डॉ0 बेनीप्रसाद के अनुसार “यदि प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने अधिकारों का ध्यान रखे तथा दुसरों के प्रति कर्त्तव्यों का पालन न करे तो शीघ्र ही किसी के लिए अधिकार नहीं रहेंगें।” अधिकार और कर्त्तव्यों का आपस में अत्यंत घनिष्ठ सम्बंध रहा है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। कर्त्तव्यों के बिना अधिकारों की मांग करना न्यायोचित नहीं है। हमारे संविधान में मौलिक कर्त्तव्यों का महत्व देश की एकता, सम्प्रभुता तथा अखण्डता की रक्षा भी देश की सुरक्षा, प्रगति, प्राकृतिक तथा सार्वजनिक सम्पति की रक्षा में लोकतंत्र को सफल बनाने में, संस्कृति की रक्षा में, विष्वबन्धुत्व की भावना के विकास में तथा स्त्रियों के सम्मान की दृष्टि से विशेष महत्व है।
Pages:12-14
How to cite this article:
डॉ पुष्पेंद्र कुमार मुशा, सुमन सांदड "मौलिक कर्त्तव्य एवं राज्य के नीति निर्देशक तत्व का मौलिक अधिकारों के साथ अध्ययन". International Journal of Advanced Educational Research, Vol 8, Issue 3, 2023, Pages 12-14
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