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VOL. 8, ISSUE 1 (2023)
सामाजिक न्याय की कसौटी पर भारतीय लोकतंत्र
Authors
डॉ. अमिता मीना
Abstract
भारतीय लोकतंत्र को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता का मूल्यांकन केवल चुनावों और प्रतिनिधित्व के आधार पर नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि वह समाज के सभी वर्गों को कितना न्याय, समान अवसर और गरिमा प्रदान करता है। सामाजिक न्याय इसी मूल्यांकन का सबसे महत्वपूर्ण मानदंड है। भारतीय संविधान ने सामाजिक न्याय को एक केंद्रीय आदर्श के रूप में स्थापित किया है, जो न केवल प्रस्तावना में बल्कि मौलिक अधिकारों, नीति-निदेशक तत्वों और विभिन्न सामाजिक-आर्थिक नीतियों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
इस शोध-पत्र का उद्देश्य भारतीय लोकतंत्र का विश्लेषण सामाजिक न्याय की कसौटी पर करना है। इसमें सामाजिक न्याय की अवधारणा, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, संवैधानिक प्रावधान, डॉ. भीमराव अम्बेडकर के विचार, स्वतंत्रता के बाद की नीतियाँ, वर्तमान चुनौतियाँ तथा सुधार के उपायों का विस्तृत अध्ययन किया गया है। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि भारत ने सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन अभी भी कई संरचनात्मक और सामाजिक बाधाएँ मौजूद हैं।
Pages:46-48
How to cite this article:
डॉ. अमिता मीना
"सामाजिक न्याय की कसौटी पर भारतीय लोकतंत्र". International Journal of Advanced Educational Research, Vol 8, Issue 1, 2023, Pages 46-48
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