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International Journal of
Advanced Educational Research

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VOL. 3, ISSUE 4 (2018)
स्वामी दयानन्द सरस्वती का शिक्षा दर्शन : सत्यार्थ प्रकाश के विशेष सन्दर्भ में
Authors
वर्षा गौतम, डाॅ0 डी0एस0 सिंह बघेल
Abstract
प्रस्तुत शोध स्वामी दयानन्द सरस्वती का शिक्षा दर्शन: सत्यार्थ प्रकाश के विशेष सन्दर्भ में आधारित है। महर्षि दयानन्द ने उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में अपना कालजयी ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश रचकर धार्मिक जगत में एक क्रांति कर दी। यह ग्रन्थ वैचारिक क्रान्ति का एक शंखनाद है। इस ग्रन्थ का जनसाधारण पर और विचारशील दोनों प्रकार के लोगों पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। प्राचीन शिक्षा पद्धति के अनुसार शिक्षा पूर्ण होने पर गुरू दक्षिणा का प्रावधान होता है परन्तु दयानंद जी के व्यास गुरू जी को देने के लिए कुछ भी नहीं था वे जानते थे कि गुरू जी को लौंग बहुत पसंद थी, तो वो दक्षिणा स्वरूप गुरू जी के पास आधा सेर लौंग लेकर पहुंचे, परन्तु गुरू जी ने अपने सुयोग्य शिष्य से दक्षिणा स्वरूप कुछ और देने को कहा- ‘‘देश का उपकार करो, सत्य शास्त्रों का उद्धार करो, मतमान्तरों की अविधा को हटाओ और वैदिक धर्म का प्रचार करो।’’
अपने गुरू के कथनानुसार स्वीकार कर दयानंद जी ने गुरू जी के आश्रम से विदा ली और अपना सम्पूर्ण जीवन उस वचन को निभाने में लगा दिया, जो उन्होंने अपने गुरू जी को दिया था और जो उन्होंने अपने गुरू जी से सीखा था।
Pages:44-47
How to cite this article:
वर्षा गौतम, डाॅ0 डी0एस0 सिंह बघेल "स्वामी दयानन्द सरस्वती का शिक्षा दर्शन : सत्यार्थ प्रकाश के विशेष सन्दर्भ में". International Journal of Advanced Educational Research, Vol 3, Issue 4, 2018, Pages 44-47
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