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VOL. 3, ISSUE 4 (2018)
बघेलखण्ड में बघेलों का अभ्यूदय एवं विकास का समीक्षात्मक अध्ययन
Authors
डाॅ0 नृपेन्द्र सिंह परिहार
Abstract
इस शोध पत्र में ‘‘रीवा स्टेट गजेटियर’’ को मूल आधार स्रोत मानते हुए बघेल वंश के अभ्युदय एवं विकास का विश्लेषण कर रहे हैं। कर्णदेव बघेल दक्षिण में देवगिरि भाग गया था। ऐसी ही भगदड़ में इस बघेल राजवंश के दो भ्राता वहाँ से पलायन कर विन्ध्य श्रृंखला से गुजरते हुए मध्य पूर्व विन्ध्य में आश्रय लिया हो तो कोई अत्युक्ति नहीं है। अपनी इस दयनीय स्थिति में इन बघेलों ने भर शासकों की सेवा ग्रहण कर ली थी और शक्ति संचय करने पर गहोरा के अधिपति बन गये थे। लोधियों की सम्पूर्ण सेना तिवारियों के आधिपत्य में थी। एक दिन जब लोधियों के यहाँ कोई महोत्सव हो रहा था और वे सब मदिरा पीकर उन्मत्त थे, उसी समय उनकी ही सेना लेकर इन्होंने चढ़ाई कर दी और विजय प्राप्त की। इसके पश्चात् महाराज व्याघ्रदेव ने तिवारियों को आधा राज्य देना चाहा, जिसे इन लोगों ने स्वीकार नहीं किया। तब महाराज ने तिवारियों को ‘‘अधरजिया तिवारी’’ की पदवी प्रदान की। उसी दिन से रीवा राज्य के तिवारी ‘‘अधरजिया’’ कहलाने लगे। महाराज विक्रमादित्य ने राज-प्रसाद और अन्य दूसरे भवन इस प्रकार बनवाये कि साधारण संरक्षित ग्राम से परिवर्तित होकर यह नगर एक बड़े राज्य की राजधानी बनने के योग्य निर्मित हो गया। महाराज विक्रमादित्य के आने से पूर्व सन् 1554 में यहाँ एक बस्ती का निर्माण शेरशाह सूरी के पुत्र जलाल खाँ (सलीमशाह) के द्वारा कराया गया था। अपने पिता की मृत्यु का समाचार पाकर जलाल खाँ यहीं से कालिंजर गया था और उसके पश्चात् सलीमशाह के नाम से दिल्ली के सिंघासन पर बैठा था। जलाल खाँ ने यहाँ पड़ाव के दौरान बीहर-बिछिया के संगम स्थल के किनारे किले की नींव डाली थी।
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Pages:17-25
How to cite this article:
डाॅ0 नृपेन्द्र सिंह परिहार "बघेलखण्ड में बघेलों का अभ्यूदय एवं विकास का समीक्षात्मक अध्ययन". International Journal of Advanced Educational Research, Vol 3, Issue 4, 2018, Pages 17-25
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