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International Journal of
Advanced Educational Research

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VOL. 3, ISSUE 2 (2018)
श्रम का अर्थ एवं श्रम संबंधी विभिन्न दृष्टिकोण
Authors
डाॅ0 राजेश कुमार
Abstract
श्रम की अवधारणा विभिन्न सामाजिक राजनीतिक मान्यताओं तथा विचारधाराओं से जुडी हुई है। पश्चिमी देशों में औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप पूंजीवाद की व्यवस्था के अभ्युदय के साथ ‘‘मांग स्वंपूर्ति के सिद्धान्त के अनुसार श्रम को वस्तु के रूप में देखा जाने लगा जिसे तत्कालीन अर्थशास्त्रियों ने श्रम को वस्तुरूपी अवधारणा के रूप में संबोधित किया।
व्यापक अर्थ में कभी-कभी श्रम को श्रमशक्ति का पर्यायवाची समझा जाता है। श्रम शक्ति में उन समस्त व्यक्तियों को सम्मिलित किया जाता है। जो न केवल रोजगार में लगे हुए अधिक रोजगार प्राप्त करने की तलाश में होते है जैसे-बैंक कर्मचारी, खान में काम करने वाले श्रमिक, डाॅक्टर, वकील, दुकानदार व्यापारी तथा काम चाहने वाला बेरोजगार व्यक्ति आदि सभी श्रम शक्ति वह है जो विविध प्रकार के श्रम का समूह है।
अर्थशास्त्र में श्रम का संबंध मनुष्य के श्रम से है। श्रम मनुष्य का वह शारीरिक एवं मानसिक प्रयत्न है जो पारिश्रमिक प्राप्त करने की आशा से लिये जाते है फ्रेढािक टेनरलिलान और फ्रेक गिलवर्ट एवं अन्य मनोवैज्ञानिकों ने उद्योगों में वैज्ञानिक प्रबंध की अवधारणा पर विचार किया।
श्रम की मशीनी धारणा ने श्रमिक को एक मशीन की भांति काम करने का औजार समझा। औद्योगिक जीवन में बढते तनावपूर्ण संकट के परिणामस्वरूप श्रम विधिशास्त्र के अध्ययन का क्षेत्र अत्यन्त आवश्यक हुआ है। श्रमिक वर्ग से संबंधित समस्याऐं जैसे- औद्योगिक संबंध, मजदूर नीति, सामाजिक सुरक्षा श्रम कल्याण, प्र्रबंध में श्रमिकों की सहभागिता आदि अभिन्न रूप से श्रम विधि शास्त्र के अध्ययन से जुडी है।
Pages:463-464
How to cite this article:
डाॅ0 राजेश कुमार "श्रम का अर्थ एवं श्रम संबंधी विभिन्न दृष्टिकोण". International Journal of Advanced Educational Research, Vol 3, Issue 2, 2018, Pages 463-464
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