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Advanced Educational Research

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VOL. 3, ISSUE 2 (2018)
पंचायतों की स्वायत्तता : वर्तमान परिदृश्य
Authors
कुमार सौरभ
Abstract
न्याय, बंधुत्व एवं समानता को समेटे हुए स्थानीय स्वशासन की आजादी के रूप में पंचायती राज व्यवस्था भारतवर्ष में एक संवैधानिक निकाय के रूप में कार्यान्वित है। ‘73वें संविधान संशोधन अधिनियम-1993’ के माध्यम से ‘आधारिक’ अधिनियम के रूप में पंचायती राज को संवैधानिक मान्यता मिली। जिसके आधार पर उत्तर-प्रदेश सरकार द्वारा ‘उत्तर-प्रदेश पंचायत विधि अधिनियम-1994’ के अन्तर्गत स्थानीय स्वशासन स्थापित किया गया। यदि हम पंचायती राज व्यवस्था की ऐतिहासिकता की बात करें तो इसकी प्राचीनता वेदों-पुराणों तक जाती है। स्थानीय स्वशासन की स्थापना का प्रथम बृहद् प्रयास चोल साम्राज्य में ‘स्वायत्तशासी ग्रामीण संस्थाओं’ के संचालन के रूप में दिखायी देता है। ब्रिटिश काल में सन् 1870 में लार्ड मेयो द्वारा एक प्रस्ताव के माध्यम से ‘वित्तीय विकेन्द्रीकरण’ पर बल दिया गया तथा सन् 1882 में लार्ड रिपन द्वारा स्थानीय स्वशासन के पुनरूद्धार के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किये गये एवं भारत शासन अधिनियम-1935 के अन्तर्गत स्थानीय स्वशासन को राज्य (प्रान्तीय) सूची के विषय के रूप में मान्यता दी गयी।
Pages:185-187
How to cite this article:
कुमार सौरभ "पंचायतों की स्वायत्तता : वर्तमान परिदृश्य". International Journal of Advanced Educational Research, Vol 3, Issue 2, 2018, Pages 185-187
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