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VOL. 3, ISSUE 2 (2018)
उत्तर-औपनिवेशिक राज्य और विकासशील देशों में राजनीतिक प्रक्रिया
Authors
डाॅ0 मेहराराम
Abstract
ऐसा राज्य जो उपनिवेशवाद के शिकंजे से नया - नया मुक्त हुआ हो। साधारणतः तीसरी दुनिया के देशों को इस श्रेणी में रखा जाता है। कई सिद्धान्तकार यह मानते हैं कि उत्तर औपनिवेशिक राज्य में विदेशी हितों का प्रभुत्व समाप्त हो जाता है, अतः उसे जनसाधारण की आशाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति का साधन बनाया जा सकता है। उत्तर - औपनिवेशिक राज्य में लोगों की नई मांगों और आशाओं के कारण जो नए द्वंद्व पैदा हो गए हैं, उन्हें शांत करने के लिए आर्थिक विकास पर ध्यान देना आवश्यक है। उत्तर-औपनिवेशिक राज्य में राजनीतिक नेतृत्व का चरित्र भी बहुत ऊँचा नहीं रह जाता। जो राजनीतिज्ञ स्वाधीनता आंदोलन के दौरान कंधे से कंधा मिलाकर विदेशी ताकत से लड़े थे, अब वे और उनके उत्तराधिकारी सता की प्रतिस्पर्धा में नए पूंजीपति वर्ग की सहायता पर आश्रित हो जाते है, यहां तक कि कुछ राजनीतिज्ञ अपराध-लोक से सहायता लेने में भी संकोच नहीं करते। नया पूंजीपति वर्ग कई गुटतंत्रों से सांठ-गांठ करके अपनी शक्ति सुदृढ़ कर लेता है और नव-उपनिवेशवाद का जाल फैलाकर उसका शोषण करता हैं। उत्तर-औपनिवेशिक राज्य में जनसाधारण की स्वतंत्रता के लिए नए खतरे और नई समस्याएं पैदा हो जाती हैं, उन्हें सुलझाए बगैर उसकी स्वाधीनता को सार्थक नहीं किया जा सकता है, अतः विकासशील देशों में राजनीतिक प्रक्रिया को राजनीतिक सहभागिता के संदर्भ में मजबूत किया जाना चाहिए।
Pages:15-17
How to cite this article:
डाॅ0 मेहराराम "उत्तर-औपनिवेशिक राज्य और विकासशील देशों में राजनीतिक प्रक्रिया". International Journal of Advanced Educational Research, Vol 3, Issue 2, 2018, Pages 15-17
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