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VOL. 3, ISSUE 1 (2018)
प्रगतिवादी काव्य की सामाजिक चेतना
Authors
उपासना
Abstract
प्रस्तुत शोधपत्र में प्रगतिवादी युग में सामाजिक भावना का चित्रण प्रस्तुत किया गया है । प्रगतिवाद काव्य की वह काव्यधारा है जो सन् 1936 में माक्र्सवादी दर्शन से प्रभावित हुई । जिसमें सामाजिक चेतना और भावबोध को प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है । प्रगतिवाद को सामाजिक यथार्थवाद के नाम पर ही चलाया गया, वह साहित्यिक आन्दोलन है जिसमें जीवन और यथार्थ को छायावादी काल से ही आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली । प्रगतिवादी काव्य की संज्ञा उस काव्य को दी गई जो छायावाद के उपरान्त सन् 1936 ई॰ के आसपास शोषण के विरुद्ध नई चेतना लेकर रचा गया । छायावाद की व्यक्तिवादी काव्यधारा की प्रतिक्रिया भी प्रगतिवादी काव्य के रूप में हुई । यह काव्यधारा काल्पनिक संसार पर आधारित न होकर जीवन के यथार्थ से जुड़ा हुआ है ।
Pages:442-443
How to cite this article:
उपासना "प्रगतिवादी काव्य की सामाजिक चेतना". International Journal of Advanced Educational Research, Vol 3, Issue 1, 2018, Pages 442-443
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