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VOL. 3, ISSUE 1 (2018)
मध्यकालीन बीकानेर की वास्तुकला (16वीं से 18वीं शताब्दी)
Authors
सुरेन्द्र सिंह
Abstract
वास्तुकला का अर्थ भवनों के विन्यास, आंकलन और रचना की, तथा परिवर्तनशील समय, तकनीक और रूचि के अनुसार मानव की आवश्यकताओं को संतुष्ट करने योग्य सभी प्रकार के स्थानों के तर्कसंगत एवं बुद्धिसंगत निर्माण की कला, विज्ञान तथा तकनीक का संमिश्रण वास्तुकला की परिभाषा में आता है। मध्ययुगीन राजस्थान के स्थापत्य में राजप्रासाद, मन्दिरों और दुर्गों का निर्माण महत्वपूर्ण है। इस युग में स्थापत्य कला की एक विशेष शैली का विकास हुआ, जिसे हिन्दू स्थापत्य शैली कहा जात है। इस शैली की प्रमुख विशेषताएँ थी - शिल्प सौष्ठव, सुदृ़ढ़ता, अलंकृत पद्धति, सुरक्षा, उपयोगिता, विशालता और विषयों की विविधता आदि। मुग़ल सत्ता के साथ समागम के पश्चात् राजस्थानी स्थापत्य में तुर्की और मुग़ल प्रभाव से नई शैली का विकास हुआ जिसे हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य शैली कहा गया है। बीकानेर की वास्तुकला को हम निम्न भागों में बांट सकते हैं - किले, मन्दिर, छतरीयां, जलाश्य, बावड़ियां। लेकिन हम यहां बीकानेर के किले में बने हुए प्रमुख भवनों की वास्तुकला पर प्रकाश डालेंगे।
Pages:368-370
How to cite this article:
सुरेन्द्र सिंह "मध्यकालीन बीकानेर की वास्तुकला (16वीं से 18वीं शताब्दी)". International Journal of Advanced Educational Research, Vol 3, Issue 1, 2018, Pages 368-370
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