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VOL. 3, ISSUE 1 (2018)
नये राज्यों की मांग का औचित्य
Authors
आशुतोष शर्मा
Abstract
भारत में राज्यों के पुनर्गठन की मांग स्वतंत्रता के पूर्व से चली आ रही है और इसके लिये अनेक आयोगों का गठन भी समय-समय पर किया गया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् राज्यों का गठन करके उन्हें इकाईवार 4 वर्गो में विभक्त किया गया था। इसके बाद भाषायी आधार पर होने वाली मांगों के फलस्वरूप सन् 1953 में एक राज्य में एक राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग ने भाषायी आधार पर राज्यों के गठन किया था। सन् 1955 में आयोग ने राज्यों के गठन से सम्बंधित रिपोर्ट प्रकाशित की। सन् 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के समय पृथक् छोटे-छोटे राज्यों को बनाने की मांग उठती रही है। 1956 में राज्यों का पुनर्गठन करके 14 राज्यों का गठन किया गया था इन राज्यों की संख्या बढ़ते-बढ़ते 25 हो गई थी। वर्तमान समय में तीन नये राज्यों उत्तरांचल, वनांचल, छत्तीसगढ़ के गठन के परिणामस्वरूप इन की संख्या 29 हो गई है। आज देश के विभिन्न भागों में पृथक् राज्य की मांगे उठती रहती है। यदि इस पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाये तो यह प्रश्न उठता है कि आखिर पृथक् राज्य की मांग क्यों उठती है? पृथक् राज्य बनाये जाने की क्या आवश्यकता है? इसके लिये विभिन्न कारणों के तर्क दिया जाते है, जैसे-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति, आर्थिक पिछड़ापन एवं बड़े राज्यों की प्रशासकीय व्यवस्था आदि।
Pages:320-323
How to cite this article:
आशुतोष शर्मा "नये राज्यों की मांग का औचित्य". International Journal of Advanced Educational Research, Vol 3, Issue 1, 2018, Pages 320-323
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