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VOL. 2, ISSUE 3 (2017)
ध्वनि काव्य की स्थापना
Authors
डाॅ0 अशोक कुमार दुबे
Abstract
आनन्दवर्धन के पूर्ववर्ती आचार्यों भरत, भामह, दण्डी, रुय्यक आदि ने वाच्य का प्रतिपादन कर अलकृ.त शब्द और अलकृ.त अर्थ तथा रीतिमयी रचना को काव्य माना परन्तु ध्वनिकार ने व्यज्जक शब्द और व्यज्जक अर्थ को ‘ध्वनि‘ कहा-
“यत्रार्थ शब्दो वा तमर्थमुपसर्जनीकृतस्वार्थौ। व्यड्क्तः काव्यविशेषः स ध्वनिरिति सूरिभिःकथित”।1
अर्थात् जहाँ अर्थ (वाच्यविशेष) अपने को तथा शब्द (वाचक-विशेष) अपने अर्थ को गुणीभूत करके उस प्रतीयमान अर्थ को अभिव्यक्त करते हैं, उस काव्य-विशेष को विद्वान् लोग ’ध्वनि’ कहते हंै। इससे वाच्य-वाचक के चारुत्व हेतु उपमा आदि और अनुप्रासादि से अलग ही ‘ध्वनि‘ का विषय है यह बताया गया है। इस प्रकार ध्वनिविरोधियों के प्रथम तर्क कि अलंकार, गुण, वृत्ति, रीतियों से पृथक् ‘ध्वनि‘ नामक नया पदार्थ कौन सा है का खण्डन हो जाता है।
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Pages:102-104
How to cite this article:
डाॅ0 अशोक कुमार दुबे "ध्वनि काव्य की स्थापना". International Journal of Advanced Educational Research, Vol 2, Issue 3, 2017, Pages 102-104
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