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VOL. 1, ISSUE 4 (2016)
पत्रिकाओं की उत्तरजीविता और संपादकः कादम्बिनी एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
Authors
पूजा डबास
Abstract
हिंदी पत्रिकाओं के इतिहास में हम देखते हैं कि पत्रिकाओं की उत्तजीविता पर उसके संपादकों का खासा असर पड़ता है। उदाहरण के तौर पर सबसे पहले नाम आता है हिंदी की प्रसिद्ध पत्रिका धर्मयुग जिसके संपादक रहे धर्मवीर भारती और दूसरी पत्रिका साप्ताहिक हिंदुस्तान जिसके संपादक रहे रघुवीर सहाय। दोनों संपादकों के जाने के बाद ये दोनों ही पत्रिकाएं कालकलित हो गयी। आमतौर पर सामाजिक-सांस्कृतिक पत्रिकाओं की विदायी उनके बड़े संपादकों के साथ ही होती रही है। पत्रिकाओं के शरीर और आत्मा दोनों का निर्धारण उसके संपादक करते रहे। अक्सर पत्रिकाओं को मिलने वाले संसाधनों की कमी या फिर बाजार की अर्थव्यवस्था में सामाजिक-सांस्कृतिक पत्रिकाओं के लिए पैसे खर्च करने की मालिकों की रुचि के समाप्त हो जाने को ठहरा दिया जाता रहा है। पर तकनीकी पिछड़ेपन के दौर में भी बिना किसी खास मार्केटिंग प्रयास के पत्रिकाएं मुनाफा कमा रही थी। क्या खास तौर पर पत्रिका के लिए बड़े संपादकों की नियुक्ति के अभाव ने इस हालात को जन्म दिया है या फिर संपादकों में सूचना विस्फोट के इस दौर में ठेठ हिंदी पाठकों के रुचि की नब्ज पर से उनकी कमजोर पकड़ ने चीजें तय की है। इन सभी में कादम्बिनी एक रोचक उदाहरण है क्योंकि हिंदी सामाजिक-सांस्कृतिक पत्रिका में यह अपने ढंग की अकेली पत्रिका रह गयी है। हर संपादक के काल में इसमें बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। समूह संपादक की अवधारणा आने के साथ कहने को तो इस काल में दो संपादक हैं मृणाल पांडे और शशि शेखर पर कार्यकारी संपादकों की एक पूरी फेहरिस्त है जिनकी रुचियों और संस्कारों का असर इसके सार चयन पर दिखता है। यह हमें तुलनात्मक अध्ययन के लिए रोचक अवसर प्रदान करता है।
Pages:62-64
How to cite this article:
पूजा डबास "पत्रिकाओं की उत्तरजीविता और संपादकः कादम्बिनी एक विश्लेषणात्मक अध्ययन". International Journal of Advanced Educational Research, Vol 1, Issue 4, 2016, Pages 62-64
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